रामायण काल में एक प्रसंग है जो बहुत कम लोग जानते है एक बार ऋषि दुर्वासा जो बहुत क्रोधी और बात-बात पर श्राप दे डालते थे उनको श्री राम की परीक्षा लेने की इच्छा हो गयी और उन्होंने अयोध्या में अपने 60 हज़ार शिष्यों के साथ आगमन किया। दुर्वासा बिना सुचना दिए सीधे राम के महल में पहुँच गए। सभी को यह देख आश्चर्य हुआ सैनिको ने श्री राम को यह सुचना दी।
तब श्री राम ने उनको प्रणाम करते हुए कहा कि भगवान यहाँ कैसे आना हुआ? दुर्वासा बोले कि मैंने और मेरे सभी शिष्यों ने 1000 वर्ष का व्रत सफल किया है इसलिए तुम हम सभी के लिए ऐसे भोजन का प्रबंध करो, जो पानी,अग्नि और दूध के उपयोग से नहीं बना होना चाहिए। इसी के साथ शिव पूजा के लिए ऐसे पुष्प प्रस्तुत करो जो अब तक किसी ने नहीं देखे हो। यदि तुम ऐसा भोजन एक मुहर्त में खिला सकते हो, तो कहो अन्यथा हम चले जाते है लेकिन श्री राम हॅसते हुए कहा आपको ऐसा भोजन जरूर मिलेगा।
उसके बाद दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ नदी स्नान को चले जाते है उसके बाद भोजन ग्रहण करने को कहते है। अब राम भी विचार में पड़ जाते है कि बिना जल,दूध और अग्नि के भोजन कैसे प्रस्तुत करे तब उन्होने अपने बाण में सभी बातों को लिखकर इंद्र की स्वर्ग नगरी में छोड़ दिया। जब इंद्र को इस बात का ज्ञान हुआ तो वे कल्पवृक्ष और पारिजात के फूलों को लेकर अयोध्या पहुंच गए।
उधर जब दुर्वासा स्नान करके आते है तो देखते है कि इंद्र देवता और राम उनके लिए सोने के बर्तन परोस रहे है इसके बाद कल्पवृक्ष से माता सीता ने भोजन की इच्छा प्रकट की और देखते ही देखते सभी बर्तनों में भोजन आ गया जिससे ऋषि दुर्वासा श्री राम पर प्रसन्न हुए और दक्षिणा लेकर चले ग
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